मैनिपुलेशन
Wildlife शो कितने बेरंग होते अगर उनमें कोई कथावाचक (Narrator) नहीं होता। दर्शकों को पता न होता क्या महसूस करना है। इन शोज़ में कथावाचक का काम एक कहानी बुनना हो जाता है, और क्योंकि जानवर बोलते नहीं, कथावाचकों के पास काफी artistic liberty होती है ये कर पाने की।
मैं एक बार डिस्कवरी (Discovery) चैनल देख रहा था। वही पुरानी, शेर और हिरण की कहानी। जैसे-जैसे कैमरा घूमता है कथावाचक हमें समझाता है क्या हो रहा है। पहले शेरनी पर कैमरा जाता जो शिकार की तलाश में निकली है। फिर एक हिरण के झुंड पर और कैमरा एक छोटे हिरण पर आ रुकता। “यह हिरण अभी बच्चा ही है” कथावाचक हमें बताता है। बाकी हिरण के झुंड से यह हिरण थोड़ा अलग खड़ा है। फिर इस हिरण को आप चलते देखते हैं और नोटिस करते हैं कि इसके कदम लड़खड़ा रहे हैं। “इसके पैर में चोट भी लगी है”। अब इस हिरण के लिए मेरे मन में सहानुभूति पैदा हो चुकी है। “बेचारा हिरण”।
कैमरा वापस से शेरनी की तरफ, जिसकी आंखें अब उसी छोटे हिरण पर फिक्स हो चुकी हैं। वह शांत कदमों से आगे बढ़ती है और झाड़ी से बाहर आते ही पूरी तेजी से झुंड की तरफ दौड़ती है। कैमरा वापस से झुंड पर, जिसे अब खतरे का पता लग गया है। दूसरों को भागता देख अपनी कहानी का मुख्य किरदार, छोटा हिरण, पूरी ताकत जुटाकर दौड़ना शुरू करता है। बीच में उसके कदम डगमगाते भी हैं, लेकिन यह जीवन मृत्यु का सवाल है, और वह पूरी कोशिश करता है। कैमरा शेरनी और हिरण के फ्रेम्स में अल्टरनेट करता और कुछ 10 सेकंड बाद वे दोनों एक ही फ्रेम में आ जाते हैं। शेरनी बस दो हाथ दूरी पर है। हिरण की टेढ़े-मेढ़े भागने की कोशिश पर भी पानी फिर चुका है। एक दर्शक के रूप में मुझे काफी गुस्सा आ रहा है इसे देख। बेचारे हिरण की चोट उसकी मृत्यु का कारण बन जाएगी। सिर्फ कुछ लम्हों की बात है और शेरनी झपट कर उसे मार देगी। मैं कुछ कर भी नहीं सकता।
अचानक वह हिरण एक पत्थर पर छलांग लगाकर अपनी दिशा उल्टी कर लेता है। उसे पकड़ने की कोशिश में शेरनी हाथ ऊपर करती है लेकिन आधे सेकंड से वह हिरण बच जाता है। जितनी देर में शेरनी रुककर अपनी दिशा बदले, वह हिरण लगभग 50 कदम दूर जा चुका है। शेरनी ने भी अब हार मान ली है। यह देख मैं खुश हो चुका हूँ। ऐसा लग रहा जैसे RCB मैच जीत गई हो या F1 में Max Verstappen को किसी ने ओवरटेक कर लिया है। कथावाचक वापस कहता है, “ऐसा हर दिन देखने नहीं मिलता कि कमजोर की जीत हो। आज फिर David vs Goliath की लड़ाई में David की जीत हुई है”।
मैं सोफे से उठकर रूम में तेज गति से टहलने लगा हूँ। इस घटना को देख वापस से दुनिया पर विश्वास बन चुका है मेरा। Hope की जीत हुई। मैं संतुष्ट, टीवी बंद करने जा ही रहा हूँ जब कथावाचक बोल पड़ता है - “आज भी शेरनी के बच्चे भूखे सोएंगे। उन्होंने पिछले तीन दिनों से कुछ नहीं खाया है।” और फिर कैमरा ज़ूम करता उन छोटे बच्चों पर जो बिना खाए एक पेड़ के नीचे इंतजार कर रहे अपनी मां का।
यह सुनकर मेरी सारी खुशी चली जाती है। यह पहले क्यों नहीं बताया? तुमने ही तो बेचारा बताया न हिरण को? हिरण को मुख्य किरदार तुमने ही तो घोषित किया और शेरनी को विलेन। Wildlife में तो कोई emotion था भी नहीं। सब food chain का ही तो हिस्सा हैं।
क्या गलत टीम के लिए रूट कर रहा था मैं? मेरे emotions के साथ खेला गया है। अब करूं तो मैं क्या करूं महसूस। फ्रस्ट्रेशन की भावना के साथ मैंने टीवी बंद कर दिया।
Reality जितनी complex हो उतना ही आसान है emotion को manipulate करना storytelling से।